RBI FCNR Deposits Strategy से बैंकों में Excess Liquidity का खतरा? ISB Professor Prasanna Tantri की बड़ी चेतावनी | Dollar Swap और Liquidity Management

RBI FCNR Deposits Strategy से बैंकों में Excess Liquidity का खतरा? ISB Professor Prasanna Tantri की बड़ी चेतावनी

नमस्ते दोस्तों, आजकल बैंकों में रुपये का अंबार लग गया है, कहीं आपने सुना? RBI ने डॉलर लाने के लिए FCNR deposits पर स्पेशल सुविधा दी थी, लेकिन नतीजा उल्टा हो गया. बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी (excess liquidity) इतनी बढ़ गई कि अब महंगाई और ब्याज दरों पर कंट्रोल कमजोर पड़ने का खतरा है.

RBI FCNR Deposits Strategy

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) के फाइनेंस प्रोफेसर प्रसन्ना तंत्रि ने हाल ही में इस पर साफ-साफ बात रखी है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि क्या हुआ और आगे क्या हो सकता है.

RBI ने क्या किया था? (RBI Dollar Strategy और FCNR Deposits)

जून 2025 में RBI ने 3 से 5 साल की नई FCNR(B) deposits के लिए स्पेशल डॉलर-रुपी स्वैप सुविधा शुरू की. NRI डॉलर जमा कर सकते थे, बैंक उसे RBI से स्वैप कर लेते और CRR-SLR से भी छूट मिलती.

नतीजा? 31 अगस्त तक लगभग 136 अरब डॉलर आ गए, जिसमें FCNR का हिस्सा करीब 127 अरब डॉलर था. डॉलर तो आ गए, लेकिन बैंकिंग सिस्टम में रुपये का अंबार जमा हो गया.

प्रोफेसर तंत्रि के अनुसार, भारत की अतिरिक्त लिक्विडिटी अब लगभग 11.6 लाख करोड़ रुपये यानी GDP का करीब 3% हो चुकी है. कुछ हफ्ते पहले यह सिर्फ 2-3 लाख करोड़ थी, ये उछाल इसी स्कीम के बाद आया.

Excess Liquidity का खतरा क्या है?

अगर RBI इस अतिरिक्त पैसे को सावधानी से नहीं सोखता, तो शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों और महंगाई पर नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है. बैंकों के पास इतना पैसा है कि वे आसानी से उधार दे सकते हैं, लेकिन मांग इतनी नहीं है. जबरदस्ती लोन देने से 2008 जैसी बैड लोन की समस्या दोबारा पैदा हो सकती है.

प्रोफेसर ने साफ कहा – बैंकों से जबरदस्ती लोन दिलवाना खतरनाक है, आज की लिक्विडिटी कल बैड लोन बन सकती है.

समाधान क्या हो सकता है? (Liquidity Management Options)

1. Market Stabilisation Scheme (MSS) – प्रोफेसर की पसंद, इसके तहत सिक्योरिटीज जारी की जाएं और पैसा अलग रखा जाए. हां, ब्याज की लागत आएगी, लेकिन ये स्थायी समाधान है.

2. CRR बढ़ाने का विरोध – बैंकों को CRR पर कुछ कमाई नहीं होती. उन्होंने पहले ही कम दिलचस्पी दिखाई है.

3. FPI आउटफ्लो – विदेशी निवेशक पैसे निकाल रहे हैं. इससे लिक्विडिटी कुछ कम हो सकती है, लेकिन RBI का विदेशी मुद्रा भंडार भी घटता है.

प्रोफेसर का बड़ा सवाल – अगर मकसद विदेशी निवेशकों को आकर्षित करना था तो कैपिटल गेन्स टैक्स कम क्यों नहीं किया? ये तरीका तो अप्रत्यक्ष सब्सिडी जैसा लगता है. NRI और FPI फायदे में हैं, जबकि पब्लिक बैलेंस शीट लागत और जोखिम उठा रही है.

आम आदमी के लिए क्या मायने?

ज्यादा लिक्विडिटी रहने से ब्याज दरें कम रह सकती हैं, लेकिन अगर महंगाई बढ़ी तो RBI को रेट बढ़ाने पड़ सकते हैं. बैंकों की सेहत और रुपये की स्थिरता दोनों पर असर पड़ सकता है.

RBI को अब सावधानी से कदम बढ़ाने होंगे. कोई मुफ्त का समाधान नहीं है – हर तरीके की कोई न कोई लागत है.

दोस्तों, अर्थव्यवस्था के ऐसे मुद्दे सीधे हमारे जेब से जुड़े होते हैं. क्या आपको लगता है RBI सही दिशा में जा रहा है? कमेंट में बताएं.

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