सुभाष चंद्रा Repayment Plan में नया ट्विस्ट: LICHF, Canara Bank और Union Bank करेंगे NCLAT Appeal | 22,000 करोड़ के दावे पर सिर्फ 6.5 करोड़
सुभाष चंद्रा के Repayment Plan पर नया मोड़: सरकारी बैंक अब NCLAT जाएंगे
कभी ज़ी और एस्सेल ग्रुप के नाम से जाना जाने वाला मीडिया जगत का बड़ा चेहरा सुभाष चंद्रा आज एक अलग चर्चा के केंद्र में हैं. उनकी personal insolvency में NCLT ने जो repayment plan मंजूर किया, उस पर अब नया ट्विस्ट आ गया है. LIC Housing Finance (LICHF), Canara Bank और Union Bank of India इस प्लान को NCLAT में चुनौती देंगे.
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आम भाषा में कहें तो बात सिर्फ आंकड़ों की नहीं है. एक तरफ 22,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के admitted claims हैं, दूसरी तरफ प्लान में क्रेडिटर्स को कुल करीब 6.25 करोड़ रुपये और प्रक्रिया खर्च के 25 लाख रुपये—यानी कुल लगभग 6.5 करोड़ रुपये, कई लोग इसे बहुत बड़ा haircut मान रहे हैं.
क्या है पूरा मामला?
यह केस Indiabulls Housing Finance की याचिका से शुरू हुआ था. सुभाष चंद्रा एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों के लोन पर personal guarantor थे, दावे मुख्य रूप से इन्हीं गारंटियों से जुड़े हैं.
25 अगस्त 2026 को NCLT ने प्लान मंजूर किया, पहले बेंच में फैसला बंटा था, बाद में तीसरे सदस्य ने प्लान के पक्ष में राय दी. प्लान को उन financial creditors का समर्थन मिला जिनका voting share करीब 80.81 प्रतिशत था.
चंद्रा पक्ष का कहना रहा है कि वे खुद कर्जदार नहीं, सिर्फ गारंटर थे. उनके अनुसार आपत्ति जताने वाले लेनदारों के दावे 22,000 करोड़ नहीं, बल्कि काफी कम हैं और ग्रुप कंपनियों ने पहले ही बड़ी रकम चुकाई है. यह दावा और अदालती फैसला दोनों अलग-अलग स्तर पर चल रहे हैं.
बैंक क्यों कर रहे हैं विरोध?
LICHF, Canara Bank और Union Bank का मिलाकर वोटिंग शेयर सिर्फ 8.45 प्रतिशत है—LICHF करीब 6.09%, केनरा बैंक 1.60% और यूनियन बैंक 0.76% फिर भी ये तीनों प्लान के खिलाफ वोट कर चुके हैं.
उनकी आपत्ति साफ है: रिकवरी बहुत कम दिखती है, उदाहरण के तौर पर LICHF के admitted claim के मुकाबले प्लान में मिलने वाली रकम बेहद छोटी बताई गई है. केनरा बैंक ने forensic audit की मांग भी की थी, लेकिन अल्पमत वोटिंग शेयर की वजह से वह प्रस्ताव नहीं चला. अब तीनों NCLAT में NCLT order को चैलेंज करेंगे, HDFC Bank भी अपील पर विचार कर रहा है.
सार्वजनिक बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनी टैक्सपेयर के पैसे से जुड़े संस्थान हैं, इसलिए वे कम रिकवरी को आसानी से स्वीकार नहीं करना चाहते.
NCLT ने प्लान क्यों मंजूर किया?
ट्राइब्यूनल का तर्क व्यावसायिक फैसले से जुड़ा था. रिपोर्ट्स के अनुसार, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की वैल्यूएशन में चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति प्लान में प्रस्तावित रकम से भी कम बताई गई. यानी प्लान खारिज होने पर दिवालिया प्रक्रिया और आगे बढ़े तो रिकवरी और कम हो सकती है. Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) में तय बहुमत पूरा होने पर प्लान बाइंडिंग माना गया.
यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, नैतिक फैसला नहीं, इसलिए बैंक अब ऊपरी अदालत में जा रहे हैं.
आगे क्या होगा?
अभी प्लान अंतिम नहीं माना जा सकता, NCLAT अपील सुन सकता है, स्थगन लग सकता है या आदेश बरकरार रह सकता है. निवेशकों, बैंकिंग सेक्टर और IBC की विश्वसनीयता—तीनों पर नजर रहेगी.
सोचिए: एक तरफ कानून बहुमत और संपत्ति की वैल्यू देखता है, दूसरी तरफ आम आदमी पूछता है कि इतने बड़े दावे पर इतनी छोटी राशि कैसे बैठती है. दोनों सवाल सही जगह से उठते हैं, सही तस्वीर अदालत के अगले आदेश से ही साफ होगी.
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ध्यान दें यह पोस्ट सार्वजनिक समाचार रिपोर्ट्स पर आधारित है, यह कानूनी सलाह नहीं है, आंकड़े और स्थिति बदल सकते हैं.
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